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Saturday, April 9, 2011

जीके पिल्लै उबाच ,सरकार और उद्योग जगत


 यह अन्ना हजारे के समर्थन में उमड़े जन सैलाब का असर हो या कुछ और। कारण जो भी हो लेकिन केंद्र सरकार अब मानने लगी है कि आर्थिक विकास का फायदा सभी वर्गो को नहीं मिल रहा है और इस वजह से ही समाज में उथल-पुथल का माहौल बन रहा है। गृह सचिव जीके पिल्लै का कहना है कि देश में असमानता दूर करने के लिए सरकार और उद्योग जगत को साथ मिलकर काम करना होगा।
शनिवार को यहां सीआइआइ के राष्ट्रीय सेमिनार के एक सत्र को संबोधित करते हुए गृह सचिव बहुत बेबाक दिखे। उन्होंने खान संपदा से भरपूर राज्यों मसलन झारखंड और पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ रही सामाजिक अस्थिरता का उदाहरण देते हुए कहा कि विकास का फायदा सभी वर्गो को नहीं मिलने की वजह से वहां इस तरह की घटनाएं ज्यादा हो रही हैं। जब तक समाज से असमानता नहीं खत्म होगी और सभी को समान अवसर नहीं मिलेंगे तब तक यह समस्या यूं ही बरकरार रहेगी।
पिल्लै ने बताया कि देश में 81 फीसदी अपराध 16 वर्ष से 21 वर्ष के आयु वर्ग के युवाओं द्वारा किया जाता है। यदि युवा आबादी का सही उपयोग नहीं किया जाए तो यह देश के हितों को नुकसान पहुंचाने वाली साबित हो सकती है।

Sunday, February 27, 2011

बंजारों की संख्या दस करोड़ ,ना राशन कार्ड,ना ही मताधिकार 500 करोड़ खर्च

/WjYCwiतमाशा दिखाने वाले बंजारों (भीलों) की जिंदगी खुद ही एक तमाशा बन कर रह गई है। इनका न कोई वर्तमान है, न ही भविष्य। उन्हें दो जून की रोटी और चंद सिक्कों के लिए कोड़ों से अपने आपको तब तक पीटना पड़ता है जब तक उनके शरीर पर खून न उतर आए और देखने वाले की आंखें गीली न हो जाएं। सरकार की किसी भी योजना से इनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। योजनाएं कागजों तक ही सीमित रहती हैं और पैसा अधिकारियों की जेब के हवाले हो जाता है। देश के महानगरों में सड़कों पर, बाजारों में कहीं भी बंजारे तमाशा दिखाते या भीख मांगते मिल जाते हैं। एक महिला गीत गाते हुए ढोल बजाती है और उसके सामने एक पुरुष अपने आपको कोड़ों से लहूलुहान करता है। कोड़ों की आवाज जितनी तेज आती है, उतनी ही अधिक तालियां बजती हैं। किंतु इनकी चीखें न सरकार तक पहुंच पाती है और न ही इन तमाशबीनों तक। ये बंजारे अमूमन 40 से 70 रुपये पूरे दिन में कमा पाते हैं। इनका यह खेल चाबुक तक ही सीमित नहीं रहता। लोगों की जेब से पैसा निकालने के लिए बंजारे अपने हाथों में लोहे के सूएं तक घोंप लेते हैं। इन बंजारों तक विकास की रोशनी नहीं पहुंच पाई है। इस वर्ग में साक्षरता दर करीब-करीब शून्य है। इसका एक कारण तो यह है कि इनके बच्चे तीन साल की उम्र से ही भीख मांगना या करतब दिखाना शुरू कर देते हैं। और दूसरे, स्थायी आवास न होने के कारण ये एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं। सहीं अथरें में इन्हें भारत का नागरिक ही नहीं समझा जाता है। जनजातियों की स्थिति के अध्ययन के लिए फरवरी 2006 में बने आयोग के अध्यक्ष बालकिशन रेनके के अनुसार केंद्र सरकार के पास इन्हें राहत देने के लिए कोई कार्ययोजना नहीं है, इसलिए इन्हें राज्यों के अधीन कर दिया गया है। पहली और तीसरी पंचवर्षीय योजना तक इनके लिए प्रावधान था लेकिन किसी कारणवश यह राशि खर्च नहीं हो सकी, तो इन्हें इस सूची से ही हटा लिया गया। काका कालेलकर आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था, कुछ जातियां अनुसूचित जाति, जनजाति एवं पिछड़ी जातियों से भी पिछड़ी हैं। योजनाओं में उनके लिए अलग से प्रावधान होना चाहिए। मुक्तिधार संस्था के अनुसार बंजारों की संख्या दस करोड़ से भी ज्यादा है। फिर भी इन्हें आज तक ना राशन कार्ड मिला है और ना ही मताधिकार का हक। देश में अनुसूचित जाति जनजाति के लिए 500 करोड़ से भी अधिक धनराशि खर्च करने का प्रावधान है लेकिन इन्हें कुछ भी हासिल नहीं। बंजारा जाति की सामाजिक एवं आर्थिक दशा काफी पिछड़ी हुई है। पिछली प्रदेश सरकारों में इस जाति को पिछड़ी जाति में शामिल करने का आश्र्वासन दिया लेकिन मामला अटका ही रह गया। सरकारी -गैरसरकारी नौकरियों पर निगाह डाली जाए तो इनकी भागीदारी लगभग नहीं के बराबर है। बंजारा जाति की सामाजिक दशा सुधारने के लिए केंद्र व प्रदेश सरकारों से इन्हें अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग भी समय-समय पर उठती रही हैं, लेकिन इनके कल्याण के लिए किसी ने कोई जहमत नहीं उठाई। राजनीतिक आकाओं ने इसलिए भी कोई पहल नहीं की कि उनके वोट भी तो नहीं मिलते। भारत सरकार को चाहिए कि मूलभूत अधिकारों से भी वंचित बंजारों को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए विशेष योजनाएं बनाए ताकि उन्हें भी औरों की तरह अपनी मुकम्मल जमीन मिल सके। आर्थिक सुधार के लिए विशेष पैकेज मिले, बच्चों के लिए नि:शुल्क कोचिंग और स्कूली व्यवस्था की जाए तभी शायद उनकी दशा सुधर सकती है।

गरीब मेधावियों की सीटें रसूख वालों के लाडले हथिया रहे हैं।

ठ्ठ कृष्ण मुरारी पाण्डेय, सिवान बिहार के सिवान जिले में स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय में गरीब मेधावियों की सीटें रसूख वालों के लाडले हथिया रहे हैं। विद्यालय में 2010-11 में प्रवेश के लिए जिले के अधिकांश विद्यालयों से ऐसे विद्यार्थियों के फार्म भरे गये हैं जिनका विद्यालय की प्रवेश पंजी में नाम ही नहीं है। प्रखंड संसाधन केंद्र के अधिकारी कमलेश्वर ओझा के भौतिक सत्यापन में इस धांधली का खुलासा हुआ है। सत्यापन में पाया गया है कि नवोदय विद्यालय में प्रवेश परीक्षा के लिए आवेदन जमा करने वाले प्राथमिक विद्यालय खुरमाबाद के 23 में से 18, उच्च मध्य विद्यालय जमसिकरी के 12 में से दो, मध्य विद्यालय नया बाजार उर्दू के 17 में से एक बच्चे का स्कूल में दाखिला ही नहीं हुआ है। अंग्रेजी माध्यम में आवेदन करने वाले जिले के 159 विद्यालयों में से अब तक 85 के अभिलेखों का सत्यापन हुआ है, जिसमें 35 विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों ने बाहरी बच्चों को नवोदय विद्यालय की प्रवेश परीक्षा में शामिल कराने का प्रयास किया है। सूत्रों के मुताबिक, रसूख वाले धन-बल के दम पर प्रधानाध्यापकों व मेडिकल टीम को प्रभाव में लेकर कमजोर और अभिवंचित वर्ग के बच्चों को विद्यालय से बेदखल कर रहे हैं। नवोदय विद्यालय के प्रधानाचार्य डा.आर. कपूर ने स्वीकारा किया कि कुछ विद्यालयों से गलत तरीके से चयन परीक्षा के लिए आवेदन जमा होने की शिकायत मिली है जिसकी जांच हो रही है। जिला शिक्षा पदाधिकारी ज्योति कुमार ने बताया कि खंड विकास अधिकरियों को गलत आवेदन फार्म चिन्हित करने के आदेश दिए गये हैं। दोषी व्यक्तियों पर कार्रवाई की जायेगी।

लोकतंत्र

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लोकतंत्र का नया शास्त्र गढ़ना होगा

लोकतंत्र के इस नए शास्त्र को गढ़ने में भारत एक विशिष्ट भूमिका अदा कर सकता है.
पहले टुनिशिया, फिर मिस्र और अब लीबिया, तो क्या लोकतंत्र की बयार अरब दुनिया तक पंहुचेगी? लोकतंत्र के ठेकेदार बड़ी मासूमियत से यह सवाल पूछते हैं.
इस सवाल में संदेह का बीज छुपा है कि क्या मुस्लिम समाज अपने आप को आधुनिक लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अनुरूप ढाल पायेगा?
लोकतंत्र के हर पश्चिमी विशेषज्ञ के पास इन दकियानूसी समाजों को लोकतान्त्रिक बनाने के नुस्खे हैं. यहाँ लोकतंत्र का भविष्य जो भी हो, लोकतंत्र के पंडे-पुजारियों का भविष्य बहुत उज्ज्वल है.

चाहे काशी हो, अजमेर शरीफ या फिर रोम, इस दुनिया का हर पवित्र विचार देर-सबेर एक व्यवसाय बन जता है.
पंडों की फ़ौज के साथ एक प्रतिष्ठान उसपर काबिज़ हो जाता है. यही लोकतंत्र के साथ हुआ है.
लोकतंत्र के नाम पर अश्वेत दुनिया को यूरोप और उत्तरी अमरीका की जीवन शैली दिखाई जा रही है, पश्चिमी उदारवार की घुट्टी पिलाई जा रही है, पूँजीवाद की व्याकरण सिखाई जा रही है.
गोरी दुनिया ने लोकतंत्र के विशेषज्ञों की एक फ़ौज तैयार कर रखी है. जैसे ही तख्ता पलट की गर्द छंट जायेगी और हवाई अड्डे सुरक्षित हो जायेंगे, वैसे ही ये ‘रायबाज़’ टिड्डियों के दल की तरह उतरने लगेंगे.

विचार बनाम व्यवसाय

देश का नाम भले ही न जानते हों, उसे लोकतान्त्रिक संविधान का खाका बनाकर देने के लिये तत्पर रहेंगे.
जीवन में एक दिन भी चाहे राजनीति न की हो, राजनीतिक दलों को प्रशिक्षण देना शुरू कर देंगे. बड़े होटलों में भले सेमिनार शुरू हो जायेंगे.

जाहिर है इस धंधे में ज्यादा सोचने की गुंजाइश नहीं रहती. विचार बने-बनाए हैं और दृष्टी सुस्थिर.
उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी एशिया को ‘मध्य-पूर्व’ कहने की रवायत इस दृष्टी का परिचायक है.
अगर भारत से देखें तो इस क्षेत्र को ‘मध्य-पश्चिम’ कहना चाहिए. निगाह दक्षिण अफ्रीकी हो तो यह ‘उत्तर कहलायेगा और अगर लातिन अमरीका के देश चिली में बैठे हों तो ‘पूर्वोत्तर’.
सिर्फ यूरोप में बैठकर ही इस इलाके को ‘मध्य-पूर्व’ कहा जा सकता है ! यह दृष्टीदोष लोकतंत्र के स्थापित शास्त्र में घुस गया है.
यानि ‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना’, मसला दुनिया भर का है, लेकिन दृष्टी यूरोपीय ही है.
लोकतंत्र के नाम पर अश्वेत दुनिया को यूरोप और उत्तरी अमरीका की जीवन शैली दिखाई जा रही है, पश्चिमी उदारवार की घुट्टी पिलाई जा रही है, पूँजीवाद की व्याकरण सिखाई जा रही है.

आकाँक्षाओं का विस्फोट

जब सोवियत संघ के टुकडे़ हुए, उसके अधिकाँश देशों में भी लोकतंत्र का ढकोसला हुआ, तरह तरह की लोकतान्त्रिक तानाशाहियाँ स्थापित हुईं, लोकतंत्र का इस्तेमाल एक बर्बर पूंजीवादी व्यवस्था को लादने के लिए किया गया.
तानाशाही या राजतन्त्र तले पिस रही जनता के विद्रोह और उसकी आकाँक्षाओं के विस्फोट को एक विशेष दिशा में मोड़ा जा रहा है.
अगर जनता इस तयशुदा मॉडल के हिसाब से विद्रोह करने को तैयार न हो तो उसे बन्दूक की नोक से तोड़ा जा रहा है.
इराक़ और अफ़गानिस्तान की तरह दुनिया के कई इलाकों में लोकतंत्र राजनैतिक स्वतंत्रता की जगह पराधीनता का पर्याय बन चुका है.

लोकतंत्र का स्थापित शास्त्र यह मान कर चलता है कि लोकतंत्र का विचार दुनिया को पश्चिमी सभ्यता की सौगात है.
दुनिया भर में नागरिक शास्त्र की पाठ्यपुस्तकें प्राचीन एथेन्स और अब्राहम लिंकन के हवाले से लिखी जाती हैं.
इसे स्वयं सिद्ध मान कर चलती हैं कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था का मतलब है कमोबेश वही संस्थागत ढांचा जैसा कि यूरोप और अमरीका के लोकतान्त्रिक समाजों ने अपनाया.
इस ढांचे में चुनाव हैं, प्रतिनिधि हैं, संसद है, उसके प्रति जवाबदेह सरकार है, कोर्ट-कचहरी है और अधिकारों की रक्षा करने वाला लिखित संविधान भी है.
लेकिन लोक और तंत्र के बीच बनी खाई तो पाटने की कोई व्यवस्था नहीं है, स्वराज कि कोई गारंटी नहीं है.

अंतरराष्ट्रीय चौकीदार

उदारपंथी सलमान तासीर यूं तो अल्पसंख्यक समुदाय के लोकतान्त्रिक अधिकारों की रक्षा के लिये शहीद हुए. लेकिन उनके हत्यारे के समर्थन में पाकिस्तान में स्वतस्फूर्त जुलूस निकले, हजारों आम लोगो ने हत्यारे के साथ सहानुभूति जताई.
लोकतंत्र की इस समझ के चलते दुनिया भर में लोकतंत्र के नाम पर खानापूरी वाले निजाम कायम हो रहे हैं.
स्वाधीनता की आकांक्षा को जल्द ही एक बने बनाए खांचे में ढाल दिया जाता है. अंतरराष्ट्रीय चौकीदारों की उपस्थिति में चुनाव हो जाते हैं.
जो तबका कल तक तानाशाही या राजतन्त्र के नाम पर राज कर रहा था, उसी तबके के कुछ नए चेहरे अब लोकतंत्र के नाम पर राज करने लगते हैं.
नए राज में जनता की आवाज़ सुनी जाती है या नहीं, इसकी किसे परवाह है. बस खेल ख़त्म, डॉलर हज़म.
अभी से हम नहीं कह सकते कि मिस्र, टुनिशिया और लीबिया में यही होगा. लेकिन अगर पूरी दुनिया में लोकतंत्र विस्तार की कहानी को देखें तो यही संभावना सबसे अधिक है.

यह त्रासदी अपने भयावह स्वरुप में इराक़ और अफ़गानिस्तान में देखी जा सकती है.
लोकतंत्र के इस नाटक में लोगों को न तो स्वराज मिला न ही सुशासन, बल्कि जो रहा सहा राज-काज और अमन था वो भी जाता रहा.
जब सोवियत संघ के टुकडे़ हुए, उसके अधिकाँश देशों में भी लोकतंत्र का ढकोसला हुआ, तरह तरह की लोकतान्त्रिक तानाशाहियाँ स्थापित हुईं, लोकतंत्र का इस्तेमाल एक बर्बर पूंजीवादी व्यवस्था को लादने के लिए किया गया.

लोकतंत्र का परचम

पश्चिम की लोकतान्त्रिक परंपरा की जाँच करके उसमे स्थानीय और सार्वभौम हिस्सों को अलग करना होगा. पश्चिम के लोकतान्त्रिक विचार की दुनिया भर में अलग अलग व्याख्या हुई.
नतीजतन लोकतंत्र का परचम अपनी आभा खो बैठता है.
लोकतंत्र की हिमायत करने वाला एक छोटा सा आधुनिकता-पसंद अभिजात्यवर्ग होता है. लेकिन जनता जनार्दन इस विचार से जुड़ नहीं पाती है.
पाकिस्तान में पंजाब सूबे के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या इस अलगाव की एक नवीनतम मिसाल है.
उदारपंथी सलमान तासीर यूं तो अल्पसंख्यक समुदाय के लोकतान्त्रिक अधिकारों की रक्षा के लिये शहीद हुए. लेकिन उनके हत्यारे के समर्थन में पाकिस्तान में स्वतस्फूर्त जुलूस निकले, हजारों आम लोगो ने हत्यारे के साथ सहानुभूति जताई.
दूसरे देशों में इस अलगाव का फायदा उठाकर शासक लोग यह दावा करते हैं कि लोकतंत्र का विचार एक विदेशी विचार है.
सिंगापुर के पूर्व-शासक ली क्वान यु तो सरेआम कहते थे कि लोकतंत्र का विचार एशिया की संस्कृति के अनुरूप नहीं है.

एक नया शास्त्र

लोकतंत्र की पश्चिमी ठेकेदारी इस खूबसूरत सपने का दम घोंट रही है. कहने को दुनिया भर में लोकतंत्र फैल रहा है.
मिस्र के लोकतंत्र में उसकी अपनी सभ्यता का ताना-बाना होगा, उसके अपने अनुभव का रंग होगा, उसके धर्म और मूल्यों की छाप होगी. लोकतंत्र के इस नए शास्त्र को गढ़ने में भारत एक विशिष्ट भूमिका अदा कर सकता है. बशर्ते हम भारतीय लोकतंत्र के भारतीय स्वरुप को चिन्हित करने और उसे अपनाने का साहस कर सकें.
हर शासक लोकतान्त्रिक होने का तगमा लटकाना चाहता है. लेकिन लोकतंत्र के विचार को इकहरा बनाये रखने की ज़िद इसे सार्वभौमिक होने से रोकती है.

इसलिए जो लोग लोकतंत्र को सचमुच सार्वभौमिक विचार के रूप में स्थापित करना चाहते हैं उन्हें लोकतंत्र के नया शास्त्र गढ़ना होगा.
यह शास्त्र प्राचीन यूनान के साथ साथ उन तमाम धाराओं और उपधाराओं की शिनाख्त करेगा जो आज लोकतंत्र के विचार का स्त्रोत हैं.
यह भारत में गणतंत्र की संस्था हो सकती है, बुद्ध संघ की परंपरा हो सकती है, इस्लाम में उम्मा कि परिकल्पना हो सकती है या फिर दुनिया भर में आदिवासी समाज के रीति-रिवाज.
बेशक इनमें से कोई भी परंपरा जैसी की तैसी लोकतान्त्रिक नहीं होगी, लेकिन कुछ अंश जरूर बहुमूल्य होंगे.
साथ ही साथ पश्चिम की लोकतान्त्रिक परंपरा की जाँच करके उसमे स्थानीय और सार्वभौम हिस्सों को अलग करना होगा. पश्चिम के लोकतान्त्रिक विचार की दुनिया भर में अलग अलग व्याख्या हुई.

आधुनिक लोकतंत्र

भारत, दक्षिण अफ्रीका और बोलिविया जैसे देशों ने पश्चिमी लोकतंत्र के ढांचे में ही अनूठे प्रयोग किये. आज यह सब एक वैश्विक विरासत का हिस्सा हैं.

जिस मिस्र ने दुनिया को सभ्यता का पाठ पढाया, उसे आज लोकतंत्र का निर्माण करने के लिये नए सिरे से राजनीति का कायदा सीखने कि जरूरत नहीं है.
बेशक लोकतान्त्रिक मिस्र, दुनिया भर के लोकतान्त्रिक प्रयोग के सबक अपने सामने रखना चाहेगा.
जैसे मिस्र की सभ्यता आज पूरी दुनिया की विरासत है, वैसे ही मिस्र आधुनिक लोकतंत्र के अनुभव का वारिस है.
लेकिन मिस्र के लोकतंत्र में उसकी अपनी सभ्यता का ताना-बाना होगा, उसके अपने अनुभव का रंग होगा, उसके धर्म और मूल्यों की छाप होगी.

लोकतंत्र के इस नए शास्त्र को गढ़ने में भारत एक विशिष्ट भूमिका अदा कर सकता है.
बशर्ते हम भारतीय लोकतंत्र के भारतीय स्वरुप को चिन्हित करने और उसे अपनाने का साहस कर सकें